मेथी की खेती जैविक तरीके कैसें करें ।

पत्तियों वाली सब्जी में मेथी भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण सब्जी है। इसकी खेती वर्षभर की जा सकती है। मेथी में पोषक तत्त्व भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। मेथी में पोषक तत्व प्रोटीन टोटल लिपिड ऊर्जा फाइबर कैल्शियमए आयरन फास्फोरसए पोटेशियमए जिंक मैंगनीज आदि तत्व पाए जाते हैं।

मेथी दाने के अलावा मेथी के पत्ते भी सेहतमंद होते हैं। सर्दियों में मेथी सेहत के लिए बहुत लाभकारी मानी जाती है। इस मौसम में पालक सरसों और मेथी की सब्जी बाजार में आ जाती है। ऐसे में इसका सेवन सेहत को बहुत लाभ पहुंचाता है। डायबिटीज को नियंत्रित करने में मेथी के पत्ते अच्छा माना जाता है

भूमि एवं जलवायु –

मेथी ठण्डी जलवायु में उगाई जाने वाली फसल है लेकिन यह कई प्रकार के जलवायु क्षेत्र में पैदा की जाती है। यह बहुत कम तापक्रम को भी सहन कर सकती है। इसके पत्तों की बढ़वार के लिए ठण्डे मौसम की आवश्यकता होती है। सामान्य से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मेथी का अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। अच्छी उपज के लिए जीवांशयुक्त उचित जल निकास वाली दोमट एवं बलुई दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। इसके लिए भूमि का उचित पी.एच. मान 6.7 है।

Read More -करेला की खेती जैविक मचान विधि करने से अच्छा आमदनी ले सकते है

मेथी की खेती जैविक तरीके कैसें करें

मेथी की खेती जैविक तरीके कैसें करें ।

उन्नतशील किस्म :मेथी की उन्नत –

शील किस्मों में पूसा अर्ली बचिंग, पूसा कसूरी मेथी प्रमुख किस्में हैं।
हरी पत्तियों व दाने के लिए हिसार सोनाली, आर.एम.टी..1, राजेन्द्र क्रान्ति प्रमुख हैं।

बीज की मात्रा एवं बुआई का समय –

उत्तरी भारत में मेथी की बुआई का उपयुक्त समय मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर माह में होता है। पूसाअर्ली वचिंग का 15-20 कि.ग्रा. तथा कसूरी मेथी का 5-7 कि.ग्रा.बीज एक हेक्टे. क्षेत्र में बुआई के लिए पर्याप्त होता है। प्रायः मेथी की बुआई खेत में छोटी-छोटी क्यारियाँ बनाकर बीज को छिंटककर की जाती है। लाइनों में मेथी की बुआई 15-20 सें.मी. की दूरी पर नाली बनाकर 1.2 सें.मी. की गहराई पर करनी चाहिए।

बीज उपचार –

बीज को 1.2 घण्टे पंचगव्य घोल में भिगोयें। थोड़ा सुखाकर ट्राइकोडर्मा तथा स्यूडोमोनास (5ग्रा./कि.ग्रा. बीज) से उपचारित करें। इसके बाद बीज को राइजोबियम (5 ग्रा./कि.ग्रा.बीज) जैव उर्वरक से उपचारित करें। बीज को छाया में सुखाएं तथा उपचार के 6 घण्टे बाद बुआई कर दें।
सिंचाई. बुआई के तुरंत उपरान्त सिंचाई करनी चाहिए तथा 4.5 दिन बाद फिर एक हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसके उपरान्त आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

खाद एवं जैविक उवर्रक  –

मेथी की अच्छी उपज के लिए उपजाऊ मिट्टी का होना जरूरी है। इसमें नाइट्रोजन की आवश्यकता कम होती है तथाराइजोबियम द्वारा बीज का उपचार व भूमि में प्रयोग करने से काफी हद तक नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है। इसमें पालक में दिये गये खाद की मात्रा का प्रयोग करें।

निकाई-गुडाई एवं खरपतवार प्रबंधन –

मेथी के साथ विभिन्न प्रकार के खरपतवार उग आते हैं जो मुख्य फसल की बढव़ार एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। प्रारम्भिक अवस्था मेंं बुआई के 20-25 दिन बाद हल्की सिंचाई कर निराई.गुड़ाई करना आवश्यक हो जाता है। तत्पश्चात् 40.45 दिन के बाद दूसरी निराई.गुड़ाई करने से खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता है तथा मेथी की जड़ों एवं पत्तियों का अच्छा विकास होता है। मेथी की अच्छी पैदावार लेने के लिए 8-10 दिन के अन्तराल पर हल्की सिंचाई करने से अच्छी पैदावार मिलती है।

कीट प्रबंधन –

मेथी की फसल पर कीड़ों का बहुत ही कम प्रभाव देखने में आया है। कभी-कभी फसल में पत्ती खाने वाली सुण्डियों तथा माहू का प्रकोप देखने में आता है।

  • वैकल्पिक परपोषी पौधों का निष्कासन।
  • 5 प्रतिशत नीम की पत्ती/निमोली सत/तरल कीटनाशी घोल का छिड़काव।

रोग प्रबंधन – पाउडरी/डाउनी मिल्डयू

  • रोग-प्रतिरोधी प्रजातियां का चुनाव।
  • प्रभावित क्षेत्रों में 1.2 वर्ष का फसल चक्र अपनाना चाहिए।
  • 10 प्रतिशत जीवामृत तथा गौमूत्र का 10 प्रतिशत 15 दिन के अन्तराल पर प्रयोग।
  • 8.10 दिन पुरानी 10.15 लीटर खट्टी लस्सी/मट्ठे में 20 ग्राम हल्दी तथा ताँबे के तार को मिलाकर और उसे 200 लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तराल पर 2.3 छिड़काव करना।

बीज उत्पादन –

मेथी की फसल से जैविक आनुवांशिक शुद्ध बीज उत्पादन लेने के लिए 2 किस्मों के बीच 50 मीटर पृथककरणदूरी रखनी चाहिए। बीज उत्पादन हेतु मेथी की दो लाइनों के बीच में 25.30 सें.मी तथा पौधे से पौधे की दूरी 10.15 सें.मी.रखनी चाहिए। प्रारम्भ में, बीज की फसल से 2.3 कटाई करने के बाद फसल को बीज उत्पादन के लिए छोड़ देना चाहिए। मेथीमें फूल आने के पहले एवं बाद में दूसरी किस्मों के पौधों को खेत से उखाडक़र फेंक देना चाहिए। बीज पकने के बाद पौधों का ेकाटकर खेत में सुखा देना चाहिए। तत्पश्चात् लगभग एक सप्ताह बाद सूखे हुए पौधों से बीजों को निकालकर, साफ करके और धूप में अच्छी तरह सुखाकर (बीज में 10 प्रतिशत नमी होनी चाहिए।) बीज को उपचारित करने के बाद किसी काँच की बोतल अथवा डिब्बे में भरकर एक सुरक्षित स्थानपर रख देना चाहिए।